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August 13, 2026
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कोरोना ने स्थापित की है वैदिक संस्कारों की प्रासांगिकता

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भविष्य की आहट / डा. रवीन्द्र अरजरिया

जीवन के बदलते मायने एक बार फिर पुरातन संस्कृति और संस्कारों की ओर बढने लगे हैं। व्यक्तिगत दूरी से लेकर अभिवादन तक के ढंग बदलने लगे हैं। आपसी व्यवहार के तरीकों से लेकर खानपान की रुचियां तक ने नये परिधान पहिन लिये हैं। दिनचर्या के अनुशासन आज प्रकृति के अनुरूप ढलने लगे हैं। योगा, व्यायाम और आसन सीखने वालों की होड लग रही है। मित्र और शत्रु के भेद उजागर होने लगे हैं। प्रकृति की ओर लौटने की होड लग रही है। वातानुकूलित कमरों को छोडकर लोग खुले आसमान के नीचे सुखानुभूति कर रहे हैं। नदी के पानी से प्यास बुझा रहे हैं। ताजी सब्जियों और फलों की खोज की जा रही है। शरीर के अन्दर की रोगप्रतिरोधक क्षमता के बढाने की दिशा में सक्रियता बढ रही है। आखिर यही तो थी हमारी वैदिक संस्कृति। हाथ जोडकर प्रणाम करना, बाहर से घर में आने के बाद सबसे पहले हाथ पैर धोना, कपडे बदलना, जूते चप्पल आदि को बाहर ही उतारना। प्रात:काल के जागरण से लेकर रात के पहले चरण में शयन के मध्य अनुशासित दिनचर्या का अनुपालन करना। घर के सदस्य व्दारा ही भोजन पकाना तथा आग्रह पूर्वक परोसना। परिवार के साथ ज्यादा समय व्यतीत करना। दूसरों के दु:ख-दर्द में भागीदारी दर्ज करना। समाज में सहयोग और सहायता के भाव से क्रिया-कलाप करना। वर्तमान में पश्चिम के देश भी योगा से लेकर हमारी वैदिक संस्कृति को अपनाने लगे हैं और हम हैं कि पाश्चात्य के जंक फूड, फास्ट फूड, डिस्को, कैबरे, नाइट वर्क, किटी जैसे कचरे को इकट्ठा करने में स्वयं को सुसंस्कारित मान लेते हैं। इस कोरोना काल में संयुक्त परिवारों का महात्व भी समझ में आ गया है और वैदिक संस्कृति के अनुशासन का बोध भी हो गया है। जिस मास्क को जैन संतों ने सैकडों वर्ष पहले जीवन का अंग बना लिया था, आज वही हमारी मजबूरी बन गया है। हाथ धोने की पुरानी आदत फिर अपनाना पड रही है। दूर से अभिवादन और बात करने की रीति फिर से लागू हो गई है। पेडों की छांव और धरती की सौंधी गंध सुहाने लगी है। शहरों की भीड गांवों की ओर आना चाहती है। भौतिकवादी वस्तुओं का मोह कम होने लगा है। इतने सारे परिवर्तनों सेे आने वाले समय का रुख दिखने लगा है। भोग-विलास के संसाधनों और धन के अकूत भंडार भी इस महामारी में कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। ज्यादातर मौतों के आंकडे उपचार के अभाव या फिर वातानुकूलित अस्पतालों को ही रेखांकित कर रहे हैं। वर्तमान परिस्थितियों की समीक्षा बताती है कि प्रकृति के अनुरूप आचरण, उससे सामंजस्य और संतुलन ही एक मात्र उपाय है जिससे जीवन को स्वस्थ, सुरक्षित और संरक्षित रखा जा सकता है। वाहनों के प्रदूषण को जैसी स्थितियों को वायुमण्डलीय ताप की वृध्दि का कारण बताने वाले परमाणु परीक्षणों, उपग्रहों की स्थापना और खगोलीय प्रयोगों से उत्पन्न होने वाली खतरनाक ऊष्मा और विकरण वाली घातक किरणों को किन्हीं कारणों से निरंतर नजरंदाज कर रहे हैं। सीमाओं के विस्तार को वर्चस्व की जंग में विजय मानने वाले वास्तव में धरती के देवता बनना चाहते हैं और इसी हेतु मारक हथियारों में होड लगी है। जैविक हथियारों का प्रयोग किया जा रहा है और अब बारी है साइबर युध्द की। हाई टेक होने के नाम पर स्वयं अपनी ही मौत का सामान जोडने वाले चांद और मंगल पर बसने की मगृमारीचिका के पीछे भाग सकते हैं परन्तु वैदिक संस्कृति में रचे बसे लोग आज भी जीवन का आनन्द प्रकृति की गोद में बैठकर ही लेते हैं। कोरोना की तीव्रता में कमी भले ही आ गई हो परन्तु प्रोग्रामिंग करके तैयार किया गया यह वायरस अपने पांचों चरण पूरे किये बिना रुकने वाला नहीं है। यह अलग बात है कि उसके प्रभाव हम अपनी जागरूकता से कम करने हेतु प्रयासरत रहें परन्तु उसका पूरी तरह से निदान तो पांचवे चरण के बाद ही होना बताया जा रहा है। इस मध्य जीवन को बचाने के प्रयासों में वासनायें कहीं खो सी गईं हैं। इच्छायें मर सी गईं हैं। अपनों के स्वास्थ और खुशी के लिए जतन किये जा रहे हैं। यहीं तो है अध्यात्म के संरक्षण में प्रकृति के सामने स्वयं को समर्पित कर देना। वैदिक संस्कारों में गंगा (नदी), कामदगिरि (पर्वत), पीपल (वृक्ष), शालिगराम (पत्थर), अमरनाथ (वर्फ) जैसों को पूज्य मानकर उनकी उपासना का विधान दिया गया था। यह कोई अंध विश्वास नहीं है बल्कि संकेतात्मक सम्मान की परम्परा है। जिसके तहत हम प्रकृति के उपकार का आभार सकारात्मक भावनात्मक ऊर्जा तरंगों के माध्यम से करते हैं। यह सब तरंगों का ही तो खेल है चाहे हम उन्हें यंत्रों के माध्यम से मंगल से तस्वीरें प्राप्त करने में लगा दें या फिर अपनी पराशक्ति से मंगल तक की दूरी नापने में ऋषियों की रीति को अपना लें। बडे हवाई जहाज बनाने वाले भी अभी तक पुष्पक विमान की तरह का यान नहीं बना पाये जिसमें अनगिनत लोगों की यात्रा का प्रबंध होने के बाद भी एक स्थान रिक्त रहता था। आग लगाने वाली मिसाइलें बनने वाले अभी तक उस आग को एक झटके में बुझाने वाली मिशाइलें नहीं बना पाये। वैदिक रहस्यों को खोजना और प्रकृति से साथ सामंजस्य स्थापित करना आज समय की मांग हो गई है। अमेरिका जैसे विकसित देश में आज आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पर हो रहे शोधों को तीव्रगति देने में जुट गये हैं। वहीं हम अपनी सम्पन्न धरोहर को हाशिये के बाहर छोडकर पश्चिम के कचरे को इकट्ठा करने में जुटे हैं। इस कोरोना में जहां अनगिनत आंखों को अपनों सें बिछुडने का दर्द दिया है तो वहीं वैदिक संस्कारों की प्रासांगिकता भी स्थापित कर दी है। तो आइये लें वैदिक संस्कारों को जीवन का अंग बनाने का सतसंकल्प। इस सप्ताह बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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