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February 25, 2026
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भविष्य की आहट / डा. रवीन्द्र अरजरिया

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धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र को जातिगत आधार पर सुदृढ करने का सपना

                    चुनावी समीकरणों से गर्माती हवाओं के मध्य पर्यावरणीय  स्थितियों की ठंडक निरंतर कम होती जा रही है। दिन के तापमान में बढोत्तरी होते ही चुनानी जंग में  सोशल मीडिया से लेकर व्यक्तिगत सम्पर्कों तक में तेजी आने लगी है। स्टार प्रचारकों को धरातल पर उतारने के साथ ही अतीत के पन्नों को पलटने का काम नित नई ऊंचाइयां छूने लगा है। भारतीय जनता पार्टी के अमित शाह ने अपनी शतरंजी चालें चल कर बाजी जीतने का ऐलान कर दिया है वहीं केन्द्र और प्रदेश सरकारों के दु:खद अध्यायों को समाजवादी पार्टी पटलने लगी है। कांग्रेस के कुछ घोषित उम्मीदवारों ने तो चुनावी टिकिट मिलने के बाद भी पार्टी को तिलांजलि दे दी है। चुनावी जंग में पंजे का परिवादवाद पर रेखांकित फार्मूला तो टिकिट वितरण के दौरान ही ध्वस्त हो गया है। उत्तराखण्ड से लेकर पंजाब तक के उदाहरण चटखारे लेकर कहे-सुने जा रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी की धीमी गति को लेकर सभी दल सशंकित हैं। आम आदमी पार्टी की ऐजेन्डा स्थान के साथ बदलता जा रहा है। वहीं अकाली दल के अंदर का असंतुष्ट खेमा भितरघात की तैयारी में लगा है। देश के अन्दर के हालातों को सीमापर से नियंत्रित करने का चक्र भी निरंतर गति पकड रहा है। खालिस्तान समर्थकों के स्लीपिंग सेल्स को फिर से एक्टिव किया जा रहा है। कश्मीर में आतंकियों की संख्या में इजाफा करने के लिए सीमा पार से गुप्त अभियान चलाया जा रहा है। चीन की शह पर नक्सलवाद की चहलकदमी भी किसी से छुपी नहीं है। लाल सलाम का खूनी रंग अपनी मौजूदगी दिखाने को बेताब है। वहीं दूसरी ओर धर्म निरपेक्ष राष्ट्र की संवैधानिक इकाई के गठन में लगभग सभी राजनैतिक दल विधानसभा क्षेत्रों में जातिगत मतदाताओं के आधार को ही टिकिट वितरण का सुविधाजनक फार्मूला रहे हैं। जातिगत भेद को मिटाकर सभी नागरिकों को समान अधिकार देने का दावा करने वाले कथित ठेकेदार ही जब जातिवाद को महात्व देकर टिकिटों का वितरण करेंगे, सम्प्रदायगत नेताओं को महात्व देंगे और फूट डालो, राज करो, की नीति अपनायें तो फिर सिंहासन पर बैठने के बाद उनका समान दृष्टिकोण होना लगभग असम्भव ही है। उत्तर प्रदेश में योगी के व्दारा ब्राह्मणों को प्रभावहीन करने की नीति अब भारतीय जनता पार्टी के गले की हड्डी बन गई है। स्थाई कर्मचारियों और अधिकारियों को आर्थिक लाभ देने के बाद संविदाकर्मियों को प्रताडित करना भी पार्टी के लिए घातक सिध्द हो रहा है। ऐसे में हिन्दुवादी ऐजेन्डा प्रदेश में पानी का बुलबुला बनता जा रहा है। संविदाकर्मियों की नाराजगी का खामियाजा भुगतने की स्थिति में पार्टी पहुंच चुकी है। एक बार फिर योगी को ही प्रदेश का मुख्यमंत्री चेहरा बताने के कारण कमल का पोषण समाप्त होता दिख रहा है। पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री तक के ओहदे ठाकुर जाति के खास लोगों को रेवडी की तरह बांट दिये गये हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के पुराने कद्दावर लोगों को केवल ब्राह्मण जाति का होने के कारण ही हाशिये पर पहुंचा देना, इस बार के चुनावी संग्राम में नकारात्मकता ही परोसता दिख रहा है। संघ के ऐसे नामची लोगों ने अपने आवासों से भितरघात करना शुरू कर दी है। उनके सम्पर्क में छात्र जीवन से रहे सैकडों लोग आज समाजसेवी लोकप्रिय व्यक्तित्व बनकर उभर चुके हैं। ऐसे लोकप्रिय व्यक्तित्वों ने एक आदर्श संघ कार्यकर्ता की उपेक्षा, अपमान और तिरस्कार अपनी जागती आंखों से देखा और जो नहीं देखा उसे संघ के उन कद्दावर नेताओं ने प्रकाशित कर दिया। इस प्रकाशन के बाद तो हाथी के दांतों की कहावत का अर्थ  सोशल मीडिया पर भरा पडा है। आज हालात यह हैं कि पंजाब में कांग्रेसी सिध्दू का इमरान-बाजवा प्रेम किसी से छुपा नहीं है तिस पर कैप्टिन अमरेन्दर सिंह के वक्तव्य ने यज्ञ में आहुति का काम किया है। इमरान की शिफारिश वाले मामले ने तो कांग्रेस की मंशा पर ही प्रश्नचिंह अंकित कर दिये हैं। विपक्ष ने तो इस मुद्दे पर नेहरू-जिन्ना से लेकर सिध्दू-इमरान तक की कडियां जोडना शुरू कर दीं हैं। केजरीवाल की कथित साफ-सुथरी छवि और योग्यता के साथ विकास माडल पर से आम नागरिकों का विश्वास उठता दिखने लगा है। अकाली दल का अपना अलग ही ऐजेन्डा है जिसे चन्द लोगों व्दारा अधिग्रहीत करने का खबरें फैल रहीं है। उत्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के बाद भी साधु-संतों को प्रताडित करने के मामलों में निरंतर बढोत्तरी होने से हिन्दुत्व के आवरण में छेद होने लगे हैं। हाथी की चाल की मस्ती अभी सामने आना बाकी है। मायावती का मायाजाल अभी भी दलित वोटों से बाजी पलटने का दम भर रहा है। ऐसे में पांचों विधानसभाओं के चुनावों में जहां मुसलमानों का वोट भारतीय जनता पार्टी के विरुध्द सबसे सशक्त उम्मीदवार को मिलना तय है वहीं यादव वोटों का परम्परागत ध्रुवीकरण समाजवादी पार्टी के पक्ष में सुनिश्चित हैं। ठाकुरों की ज्यादातर अंगुलियां कमल के निशान को दबाते दिख रहा है वहीं वैश्य समाज का एक बडा तबका भाजपा के साथ होने का संकेत दे रहा है परन्तु ऊहापोह की स्थिति में फंसा ब्राह्मण अभी भी अनिर्णय की परिस्थितियों में गोते लगा रहा है। एक ओर योगी और ओबैसी ने हिन्दू-मुस्लिम के मध्य खाई गहरी की है वहीं अखिलेश और मायावती ने पिछडों और दलितों को अलग किया है। केजरीवाल ने मुफ्तखोरी की आदत को सरकारी सुविधा का नाम देकर लोकप्रियता के ग्राफ में छलांग लगाने का फार्मूला अपनाया था उसे अनेक राज्यों ने कोरोना की आड में गरीबों का सहयोग करना बताकर चरम सीमा पर पहुंचा दिया। लालच, प्रलोभन और सब्जबाग दिखाने का क्रम निरंतर जारी है। सरकारों व्दारा दी जाने वाली सुविधायें वास्तव में ईमानदार करदाताओं की खून-पसीने की कमाई के दुरुपयोग के रूप में परिभाषित होने लगी है। मुफ्तखोरी से जहां देश में कामचोरी की आदत परवान चढने लगी है वहीं नित नये करों का प्राविधान करने की प्रशासनिक नीतियां राष्ट्रभक्तों का खून चूसने जैसी होती जा रहीं है। स्थाई सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों के भारी भरकम वेतन, बाद में भविष्य निधि की एक मुस्त मोटी रकम और आवश्यकता से अधिक राशि को पेन्शन के नाम पर देने से अब आम आवाम में खासा रोष व्याप्त होता जा रहा है। जबकि वास्तविकता तो यह है कि संविदा पर काम करने वालों की मेहनत पर ही विकासात्मक कीर्तिमान गढे जाते है, और पुरस्कृत होते हैं स्थाई अधिकारी। चुनावी काल में संविदाकर्मियों की सेवाओं को अदृष्टिगत करना, उन्हें कोल्हू का बैल समझने जैसा माना जा रहा है। उनके नियमित होने की आशाओं पर पानी फेर दिया गया है। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र को जातिगत अवधारणा के आधार पर सुदृढ करने का सपना कोई मुगेरीलाल ही देख सकता है, आज यह बात ज्यादातर लोगों को समझ में आ गई है। ऐसे में चुनावी परिणामों के ऊंट की करवट पर कुछ कहना फिलहाल जल्दी होगी। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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