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September 1, 2026
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मनोरंजन

अटैक : देश के दुश्मनों का सफाया करने के लिए फौजी बना सुपरहीरो

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फिल्म समीक्षा – ढाई स्टार

गायत्री साहू,

देश प्रेम और एक्शन का ओवरडोज़ दिखायी देगी जॉन अब्राहम की फ़िल्म अटैक में। वर्तमान समय में अभिनेता जॉन अब्राहम देशभक्ति और मारधाड़ से भरी फिल्में ही बना रहे हैं जिसमें ‘सत्यमेव जयते की दोनों कडियाँ, मद्रास कैफे, परमाणु, रोमियो अकबर वाल्टर, बाटला हाउस’ के साथ अब ‘अटैक’ फ़िल्म भी शामिल है।
जॉन अब्राहम की इस नई फ़िल्म की बात करें तो यह एक पैरालाइज फौजी की कहानी है जो विज्ञान की मदद से एक सुपरहीरो जैसे शक्तियों का मालिक बन जाता है। अर्जुन (जॉन अब्राहम) एक बहादुर जिम्मेदार फौजी ऑफिसर है जिसे आतंकी गिरोह के सरगना को पकड़ने की जिम्मेदारी मिलती है। अर्जुन इस मिशन में कामयाब भी होता है। लेकिन इस मिशन में वह भावना में बहकर एक ह्यूमन बम बने बच्चे हमीद गुल की जान बख्श देता है जो बाद में एक खूंखार आतंकवादी बनता है। मिशन के कामयाब होने के बाद वापस घर जाते समय उसकी मुलाकात एयर होस्टेस आएशा से होती है और दोनों को एक दूसरे से प्यार हो जाता है। आएशा से मिलने के लिए अर्जुन एक बार एयरपोर्ट आता है वहीं आतंकवादियों का हमला हो जाता है जिसमें आयशा मारी जाती है और पीठ पर गोली लगने से वह सदा के लिए लकवा ग्रस्त हो जाता है। उसकी माँ देखरेख करती है। तभी उच्च अधिकारी सुब्रमण्यम (प्रकाशराज) को देश के दुश्मनों से लड़ने के लिए एक बेहतरीन आइडिया आता है। वह आइडिया यह है कि डॉक्टर सबा (रकुलप्रीत) द्वारा बनाया गैजेट्स जो दिव्यांग इंसान को कंप्यूटर चिप की मदद से चलने फिरने के काबिल ही नहीं बनाता बल्कि इतना शक्तिशाली बना देता है कि वह अकेले पूरी फौज से लड़ सके। यह प्रयोग अर्जुन पर किया जाता है जो सफल रहता है। इधर हामिद गुल पूरे पार्लियामेंट को अपने कब्जे में लेकर पूरी दिल्ली को तबाह करने की तैयारी करता है। अब अर्जुन प्रधानमंत्री सहित पूरे दिल्ली की रक्षा कैसे करता है यही फ़िल्म में रोचकता का प्रभाव पैदा करता है जिसे सिनेमाघर पर देख कर ही आनंद लिया जा सकता है।

फ़िल्म के निर्देशन की बात करें तो निर्देशक लक्ष्य राज आनंद ने कुछ नया करने का प्रयोग किया है। दृश्य काफी बेहतरीन है जिसे पर्दे पर देखना अच्छा लगता है। फ़िल्म के कुछ ही संवाद अच्छे हैं लेकिन फ़िल्म की पटकथा कुछ अटपटी लगी। कहानी में नयापन नहीं है। कहानी से ज्यादा एक्शन में ध्यान दिया गया है। जैसे फ़िल्म में आतंकवादी संगठन का जिक्र ना होकर एलटीटी संगठन का जिक्र होना। पूरे पार्लियामेंट पर कब्जा। फ़िल्म में बढ़िया एक्शन और वीएफएक्स है फिर भी फ़िल्म की ताल अपने लय से हट जाती है। कृष के रूप में हिंदी फिल्म के दर्शकों ने एक सुपरहीरो को स्वीकार कर लिया है जिसके आगे फिल्म ‘रा वन’ के जी. वन और फ्लाइंग जट्ट को नकार दिया गया। अटैक में जॉन सुपरहीरो बनकर शायद ही कोई करिश्मा कर पाएं। इंग्लिश फ़िल्म अवतार के जैसे दिव्यांग अर्जुन सुपर ह्यूमन बन जाता है। जैकलीन और रकुलप्रीत ने फ़िल्म में ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ा। फ़िल्म के गाने भी साधारण है। प्रकाशराज, किरणकुमार और रंजीत कपूर का भी प्रभाव कम रहा। पूरी फिल्म में जॉन अब्राहम का फाइटिंग सीन ही है जो दर्शकों को पसंद आ सकता है। रोमांटिक सीन प्रभावहीन है। एक्शन के मामले में फ़िल्म ‘आरआरआर’ के सामने अटैक की रफ्तार फीकी पड़ सकती है।


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