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October 17, 2026
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मनोरंजन

शिक्षा के महत्व को अनोखे रूप से दर्शाती है ‘दसवीं’

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अभिषेक-यामी-निमरत का दमदार अभिनय

फिल्म समीक्षा – चार स्टार,

गायत्री साहू,

मुम्बई। वर्तमान समय में देशप्रेम, एक्शन और ड्रामा फिल्मों का दौर चल रहा है और दर्शकों का ढेर सारा प्यार भी पा रहा है। इनमें कुछ सफल तो कुछ असफल भी हो रही है। दक्षिण भारतीय फिल्मों ने भी रुपहले पर्दे पर अपना सिक्का जमा लिया है। आज के समय में फिल्मों की सफलता केवल बॉक्स ऑफिस की खिड़कियों पर निर्भर नहीं बल्कि फिल्मों का भविष्य डिजिटल प्लेटफार्म पर भी निर्भर करता है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अभिषेक बच्चन की फ़िल्म ‘द बिग बुल’ की सफलता के बाद एक बार फिर अभिषेक बच्चन, यामी गौतम और निमरत कौर अभिनीत फिल्म ‘दसवीं’ आ रही है। तुषार जलोटा फ़िल्म के निर्देशक हैं और मैडॉक फिल्म्स प्रोडक्शन और बेक माय केक फिल्मस ने फ़िल्म का निर्माण किया है। फ़िल्म ‘दसवीं’ जियो सिनेमा एंड नेटफ्लिक्स पर 7 अप्रैल 2022 को रिलीज हो रही है।
फ़िल्म की शुरुआत देख कर महसूस होता है कि यह किसी राजनेता के निजी जिंदगी के कुछ पलों से प्रभावित है लेकिन फ़िल्म का अंदाज़ काफी अलग है। हरितप्रदेश का मुख्यमंत्री गंगा राम चौधरी (अभिषेक बच्चन) है जिसकी पत्नी घरेलू महिला बिमला देवी (निमरत कौर) है। मुख्यमंत्री कम पढ़ा लिखा, घमंडी और घोटाले में लिप्त नेता है जिसे यह पद विरासत में मिला है। वहीं उसकी पत्नी भी गांव की महिला है जो दुनियादारी से अनजान अपने घर परिवार और जानवरों की सेवा में उलझी हुई है। मुख्यमंत्री के गुंडों को महिला पुलिस अधिकारी ज्योति देशवाल (यामी गौतम) सबक सिखाती है जिसका तबादला गंगा राम चौधरी करवा देते हैं। घोटाले में लिप्त मुख्यमंत्री गंगा राम चौधरी शिक्षक भर्ती घोटाले में अपराधी घोषित होने पर जेल चले जाते हैं। जेल में वे जेलर की सहायता से सुख सुविधा प्राप्त कर रहे हैं इधर उनकी पत्नी बिमला देवी को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया जाता है। जेल में बैठे बैठे ही गंगा राम चौधरी अपनी पत्नी का सहयोग करते हैं। पहले बिमला देवी राजनीति से अनजान थी लेकिन बाद में मुख्यमंत्री बनने पर उन्हें आजादी और ताकत महसूस होती है। इधर उसी जेल में ज्योति सुपरिटेंडेंट बनकर आती है। सक्त और ईमानदार ऑफिसर के नियम के आगे गंगा राम झुकना नहीं चाहते, वह नए नए प्रपंच रचते हैं काम से छुटकारा पाने को लेकिन सफल नहीं होते फिर गंगा राम को लगता है कि यदि वो पढ़ाई करेंगे तो काम से मुक्ति मिल जाएगी। इधर उनकी पत्नी बिमला देवी चाहती है कि वो सदा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे और ज्योति देशवाल चाहती है कि मुख्यमंत्री में सुधार आये। मुख्यमंत्री दसवीं की परीक्षा का बहाना बनाकर काम से बचना चाहता था उसकी मंशा जानकर सुपरिटेंडेंट ज्योति उन्हें सबक सीखने के लिए अनपढ़ और जाहिल होने का ताना मारती है। ज्योति की बात गंगाराम को चुभ जाती है ओर वह ठान लेता है यदि दसवीं पास नहीं हुआ तो पुनः मुख्यमंत्री नहीं बनेगा। क्या गंगाराम चौधरी अपनी बात पर खरा उतरता है? क्या बिमला देवी आसानी से मुख्यमंत्री पद गंगाराम को देगी? क्या गंगाराम में शिक्षा ग्रहण कर कोई सुधार हुआ? क्या सुपरिटेंडेंट ज्योति गंगाराम चौधरी को दसवीं पढ़ने की इजाजत देगी? इन सब बातों को जानने के लिए फ़िल्म देखना बेहद रोचक रहेगा।
फ़िल्मांकन की बात करें तो निर्देशक ने बेहद अच्छा काम किया है। फ़िल्म के कई दृश्य में स्वतंत्रता संग्राम के समय के कुछ दृश्यों को जीवंत कर अच्छे से समझाने की कोशिश की गयी है।
फ़िल्म मुख्य रूप से अभिषेक बच्चन, यामी गौतम और निमरत कौर की भूमिका पर निर्भर है जिसमें तीनों कलाकार प्रभावी रहे हैं। गंवार, अनपढ़, घरेलू महिला से लेकर भ्रष्ट मुख्यमंत्री बनने का किरदार निमरत कौर ने बहुत बढ़िया निभाया है। इस किरदार की झलक हुमा कुरैशी की फ़िल्म महारानी से मिलता जुलता है। सक्त महिला ऑफिसर के रूप में बेहद प्यारी लगी हैं यानी गौतम। घमंडी चौधरी के रूप में अभिषेक बच्चन ने बखूबी अभिनय प्रदर्शन किया है।
फ़िल्म के गीत सचिन जिगर का है जो साधारण लगे हैं। फ़िल्म के संवाद बेहद अच्छे है और रोचक हैं। संवाद हंसी के साथ सीख भी देते हैं। फ़िल्म में शिक्षा के महत्व को बड़ी खूबी के साथ बताया गया है और यह भी बताया है कि हमारे आसपास की चीजों में भी शिक्षा छुपी है जिसे खोजना हमारा काम है। फ़िल्म का संवाद ‘इतिहास से ना सीखने वाले खुद इतिहास बन जाते हैं’ इसका टर्निंग पॉइंट है। यह फ़िल्म साधारण और संदेशपरक फ़िल्म है। फ़िल्म में भव्यता नहीं है लेकिन यह फ़िल्म मनोरंजन और अपनी सौम्यता के साथ एक बड़ी सीख देती है जिसे सभी वर्ग को देखना चाहिए।


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