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June 8, 2026
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वंश की विरासत से मुखिया बनाने वाले दलों पर मडराता खतरा

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भविष्य की आहट / डा. रवीन्द्र अरजरिया

सत्ता सुख के लिए आदर्श, सिध्दान्त और मर्यादायें हाशिये पर पहुंचने लगीं है। अह्म के समुन्दर में डूबे लोग स्वार्थ के ज्वार-भाटे सरीखे दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं। महाराष्ट्र की राजनीति का घटना क्रम इस का जीवन्त उदाहरण है। बाला साहब ठाकरे ने जिन कल्पनाओं को लेकर छत्रपति को आराध्य माना था, उन्हें वंश सूत्र ने न केवल तार-तार कर दिया बल्कि अस्तित्वहीन करने की पुरजोर कोशिश की। राज ठाकरे की दावेदारी को नकराते हुए उध्दव ने जिस तरह से परिवारवाद को स्थापित किया था, वह पार्टी के भविष्य को तय करने के लिए तभी पर्याप्त था। जहां-जहां भी प्रतिभाओं पर कुठाराघात हुआ वहीं तानाशाही के परचम तले स्वार्थ ने ठहाके लगाये, चाटुकारों की मौज हुई और शुरू हुआ मृगमारीचिका के पीछे भागने का सिलसिला। दहाडते हुए शेर के प्रतीक और छत्रपति की प्रतिमा के साथ शिव सेना की नींव रखी गई थी। सत्ता का मोह बाला साहब को कभी नहीं रहा परन्तु उनके पुत्र ने परिवार का मुखिया बनने के बाद पार्टी को भी विरासत के तौर पर हथिया लिया। आदित्य ने तो दो कदम आगे चलकर अपने पिता के सामने ही निर्णय देना शुरू कर दिये है। पिता के अनेक कार्यों को उन्होंने सीधा प्रभावित किया है। वर्तमान हालातों पर आदित्य ने पार्टी की हालिया सोच को जिस अंदाज में प्रदर्शित किया, उससे यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि लुंगी के विरोध में फहराने वाला परचम बेहद कठिन दौर से गुजर रहा है। एकनाथ शिंदे व्दारा बाला साहब की ओर यू टर्न लेते ही पार्टी के सशक्त सिपाहसालारों ने उन्हें अपना नेता स्वीकार कर लिया। परिवारवाद के मकड जाल में उलझी देश की राजनीति ने जहां तुष्टीकरण के हथियार से आत्मघाती कदमों पर ठहाके लगाये, वहीं फूट डालो-राज करो के सिध्दान्त को मूल मंत्र मानकर व्यक्तिगत स्वार्थ का जमकर पोषण किया। अतीत गवाह है कि इंदिरा गांधी के बाद जिस तरह से राजीव गांधी की ताजपोशी हुई। वह किसी से छुपी नहीं है परन्तु राजीव गांधी के बाद जिस तरह से सोनिया गांधी को चन्द काग्रेसियों ने सिंहासन पर बैठा कर अप्रत्यक्ष में कमान संभाली, उससे पार्टी की जडें खोखली होती चलीं गई। सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी, प्रियांका गांधी जैसे परिजनों को देश का भाग्य विधाता मानने वाले, इस परिवार की समझ को ही सर्वोपरि मानते हैं। ऐसा ही हाल अनेक दलों में देखने को मिलता रहा। शिव सेना के सनातनी चेहरे पर मास्क लगा दिया गया। आज देश के अधिकांश राज्यों से शिव सेना की इकाइयां निष्क्रिय हो रहीं हैं। महाराष्ट्र के अन्दर ही अनेक जिलों की इकाइयों के निष्ठावान कार्यकर्र्ताओं ने राजनैतिक सक्रियता को तिलांजलि देने शुरू कर दिया है। अन्य राज्यों में तो हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। अन्याय के विरुध्द होने वाले प्रदर्शनों में मुट्ठी भर लोग जुटाना भी मुश्किल हो रहा है। तिस पर उध्दव व्दारा जारी होने वाले फरमानों की भाषा गुलामों को दिये जाने वाले हुक्म में बदलती चली गई। रही सही कसर संजय राउत ने पूरी कर दी। एक जमाना था जब बाला साहब की सोच को सामना में पढने वालों तथा उसे अनेक अखबारों में टिप्पणी सहित छापने वालों की कमी नहीं थी। चीन के ग्लोबल टाइम्स की तरह ही सामना को शिव सेवा के परिपेक्ष में लिया जाता था। आज अमर्यादित भाषा और उसमें छुपा अहंकार का पुट पाठकों को रास नहीं आ रहा है। सत्ता हथियाने की गणित बैठाने में शिव सेना ने विपरीत सिध्दानों वाले दलों के साथ हाथ मिलाया और फिर अपनों को रेवडी बांटने में खुद ही अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। अहंकार, सत्ता मद और स्वार्थ की तिपाई पर लम्बे समय तक संतुलन कायम रख पाना संभव नहीं होता है और वही हुआ। दिखाने और खाने वाले दांतों में विभेद होते ही सिध्दान्त प्रिय लोगों ने किनारा करना शुरू कर दिया। शिव सेना ने भाजपा को औकात दिखाने के लिए जो संकल्प लिया था, वही अतिउत्साह उसके लिए पतन का कारण बन गया। एकनाथ शिंदे के साथ जुटे लोगों में अधिकांश बाला साहब को देवतुल्य मानते हैं जबकि दूसरी ओर शरीर त्यागने के बाद मातोश्री में ही बाला साहब अनेक अवसरों पर अप्रासांगिक होते रहे हैं। महाराष्ट्र का उदाहरण आने वाले समय में अनेक स्थानों पर देखने को मिलेगा। चौराहों-चौपालों से लेकर गली-कूचों तक में उध्दव ठाकरे के कृतित्व पर चर्चाओं का बाजार गर्म है। वंशवाद पर चलने वाले दलों को इस शिव सेना प्रकरण से सीख ले लेना चाहिए। प्रतिभा का सम्मान, नेतृत्व की क्षमता और पारदर्शी निर्णय लेने का साहस ही आने वाले समय में लोगों को आकर्षित कर सकेगा। कथनी और करनी में समानता लाये बिना ज्यादा दिनों तक लोगों को भ्रमित नहीं किया जा सकता। वंश की विरासत से मुखिया बनाने वाले दलों पर मडराता खतरा निरंतर गहराता जा रहा है। देश के अनेक राजनैतिक दलों ने समाजसेवा की सादगी को छोडकर कर व्यवसायिकता का फैशन अख्तिर कर लिया है। यह न तो राष्ट्र के हित में है और न ही संगठन के हित में। राष्ट्र हित में राजनैतिक दलों को स्वार्थपरिता का परित्याग करना होगा, वंश वृक्ष के तले होने वाले दावों को खारिज करना होगा और देना होगा जागृत प्रतिभाओं को नेतृत्व। तभी सार्थक परिणाम सामने आ सकेंगे अन्यथा बाह्य आक्रान्ताओं से कहीं ज्यादा घातक बनकर भितरघाती कष्ट देंगे। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।


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